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Some political organizations established before the formation of the Indian National Congress
jp Singh 2025-05-29 10:26:10
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थपना से पूर्व स्थापित कुछ राजनीतिक संस्थाये

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थपना से पूर्व स्थापित कुछ राजनीतिक संस्थाये
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना 1885 में हुई, लेकिन उससे पहले 19वीं सदी में भारत में कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक संस्थाएं स्थापित हो चुकी थीं। ये संस्थाएं ब्रिटिश शासन की नीतियों के खिलाफ भारतीय हितों को उठाने और राजनीतिक जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण थीं।
1. बंगाल लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838)
स्थापना: 1838 में, कलकत्ता में। संस्थापक: द्वारकानाथ टैगोर और अन्य जमींदार। उद्देश्य: जमींदारों के हितों की रक्षा करना, विशेष रूप से ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों (स्थायी बंदोबस्त) के खिलाफ। ब्रिटिश सरकार से संवैधानिक सुधारों की मांग करना। महत्व: यह भारत में पहली संगठित राजनीतिक संस्था थी। इसने ब्रिटिश सरकार को प्रार्थना पत्र (Petitions) भेजकर भारतीयों की समस्याओं को उठाया। इसने राजनीतिक संगठन की नींव रखी।
2. ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (1851): स्थापना: 1851 में, कलकत्ता में। संस्थापक: देवेंद्रनाथ टैगोर, राधाकांत देब, और अन्य। उद्देश्य: बंगाल के जमींदारों और मध्यम वर्ग के हितों की रक्षा करना। ब्रिटिश सरकार की नीतियों, जैसे कराधान और प्रशासनिक भेदभाव, के खिलाफ आवाज उठाना। भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी की मांग। महत्व: इसने बंगाल में राजनीतिक चेतना को बढ़ाया। 1853 के चार्टर एक्ट के नवीकरण के समय इसने भारतीय प्रतिनिधित्व की मांग की।
3. बॉम्बे एसोसिएशन (1852): स्थापना: 1852 में, बॉम्बे में। संस्थापक: नौरोजी फरदुनजी, दादाभाई नौरोजी, और अन्य। उद्देश्य: ब्रिटिश नीतियों, विशेष रूप से आर्थिक और प्रशासनिक, के खिलाफ आवाज उठाना। भारतीयों के लिए बेहतर प्रशासनिक और आर्थिक अवसरों की मांग। महत्व: इसने पश्चिमी भारत में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया। दादाभाई नौरोजी जैसे नेताओं ने बाद में राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4. मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852): स्थापना: 1852 में, मद्रास में। संस्थापक: गजुलु लक्ष्मीनरसु चेट्टी और अन्य। उद्देश्य: दक्षिण भारत में ब्रिटिश शासन की नीतियों के खिलाफ जनमत तैयार करना। भू-राजस्व और कर नीतियों में सुधार की मांग। भारतीयों के लिए नौकरशाही में अधिक अवसर। महत्व: इसने दक्षिण भारत में राजनीतिक संगठन की शुरुआत की। स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय मंच पर उठाने का प्रयास किया।
5. पूना सर्वजनिक सभा (1870): स्थापना: 1870 में, पूना (महाराष्ट्र) में। संस्थापक: महादेव गोविंद रानाडे, गणेश वासुदेव जोशी। उद्देश्य: सामाजिक और राजनीतिक सुधारों को बढ़ावा देना। ब्रिटिश सरकार को भारतीय जनता की समस्याओं से अवगत कराना। जनता और सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाना। महत्व: इसने पश्चिमी भारत में राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाया। रानाडे जैसे नेताओं ने सामाजिक सुधारों के साथ-साथ राजनीतिक जागरूकता पर जोर दिया।
6. इंडियन एसोसिएशन (1876): स्थापना: 1876 में, कलकत्ता में। संस्थापक: सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस। उद्देश्य: भारतीयों के लिए स्वशासन और बेहतर प्रशासन की मांग। सिविल सेवा परीक्षा (ICS) में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने के लिए आंदोलन। राष्ट्रीय एकता और जागरूकता को बढ़ावा देना। महत्व: इसने बंगाल में मध्यम वर्ग को संगठित किया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने इसे राष्ट्रीय मंच के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। इल्बर्ट बिल विवाद (1883) के दौरान इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
7. मद्रास महाजन सभा (1884): स्थापना: 1884 में, मद्रास में। संस्थापक: एम. वीरराघवाचारी, जी. सुब्रमण्यम अय्यर, पी. आनंदाचार्लु। उद्देश्य: दक्षिण भारत में राजनीतिक जागरूकता फैलाना। ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ संवैधानिक तरीके से विरोध करना। भारतीयों के लिए अधिक प्रशासनिक और विधायी प्रतिनिधित्व की मांग। महत्व: इसने दक्षिण भारत में राष्ट्रीय आंदोलन की नींव रखी। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के लिए प्रेरणा स्रोत बनी।
8. बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843): स्थापना: 1843 में, कलकत्ता में। संस्थापक: जॉर्ज थॉम्पसन और अन्य बंगाली बुद्धिजीवी। उद्देश्य: भारतीयों और ब्रिटिश शासकों के बीच बेहतर संबंध स्थापित करना। ब्रिटिश शासन की नीतियों, विशेष रूप से आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों, की आलोचना करना। भारतीयों की समस्याओं को ब्रिटिश संसद तक पहुंचाना। महत्व: इसने बंगाल लैंडहोल्डर्स सोसाइटी के बाद राजनीतिक जागरूकता को और बढ़ाया। इसने भारतीयों को संगठित रूप से अपनी मांगें प्रस्तुत करने का मंच प्रदान किया। हालांकि, यह मुख्य रूप से बंगाल के अभिजात वर्ग तक सीमित थी।
. मद्रास नेटिव पब्लिक एसोसिएशन (1849): स्थापना: 1849 में, मद्रास में। संस्थापक: स्थानीय शिक्षित मध्यम वर्ग और व्यापारी। उद्देश्य: दक्षिण भारत में ब्रिटिश शासन की नीतियों, जैसे भारी कर और भू-राजस्व व्यवस्था, के खिलाफ आवाज उठाना। स्थानीय समस्याओं को सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना। महत्व: इसने दक्षिण भारत में राजनीतिक सक्रियता को प्रोत्साहित किया। बाद में यह मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852) के गठन का आधार बनी।
10. ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (1866): स्थापना: 1866 में, लंदन में। संस्थापक: दादाभाई नौरोजी। उद्देश्य: ब्रिटिश जनता और संसद को भारत की समस्याओं (विशेष रूप से आर्थिक शोषण) से अवगत कराना। भारतीयों के लिए सिविल सेवा और प्रशासन में अधिक अवसरों की मांग करना। धन निष्कासन (Drain of Wealth) जैसे मुद्दों को उठाना। महत्व: यह पहली ऐसी संस्था थी, जो ब्रिटेन में भारतीय हितों की पैरवी करती थी। दादाभाई नौरोजी ने इसके माध्यम से ब्रिटिश संसद में भारतीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया। इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान किया।
11. इंडियन लीग (1875): स्थापना: 1875 में, कलकत्ता में। संस्थापक: शिशिर कुमार घोष। उद्देश्य: भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना और एकता को बढ़ावा देना। ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ जनमत तैयार करना। सामाजिक और राजनीतिक सुधारों को प्रोत्साहित करना। महत्व: इसने इंडियन एसोसिएशन (1876) की स्थापना के लिए आधार तैयार किया। इसने मध्यम वर्ग को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2. इंडियन नेशनल सोसाइटी (1878): स्थापना: 1878 में, बंगाल में। संस्थापक: सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस (इंडियन एसोसिएशन से पहले)। उद्देश्य: भारतीयों के लिए सिविल सेवा (ICS) परीक्षा में सुधार और आयु सीमा बढ़ाने की मांग। ब्रिटिश शासन की नीतियों के खिलाफ संगठित विरोध। महत्व: इसने इंडियन एसोसिएशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इसने राष्ट्रीय स्तर पर भारतीयों को एकजुट करने की कोशिश की।
13. पब्लिक एसोसिएशन ऑफ मिरजापुर (1861): स्थापना: 1861 में, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)। संस्थापक: स्थानीय व्यापारी और शिक्षित वर्ग। उद्देश्य: स्थानीय स्तर पर ब्रिटिश नीतियों, विशेष रूप से व्यापार और कर नीतियों, के खिलाफ आवाज उठाना। भारतीय व्यापारियों के हितों की रक्षा करना। महत्व: इसने उत्तर भारत में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया। यह स्थानीय स्तर पर संगठित विरोध का एक उदाहरण थी।
14. लैंडहोल्डर्स सोसाइटी ऑफ पूना (1838): स्थापना: 1838 में, पूना (महाराष्ट्र) में। संस्थापक: स्थानीय जमींदार और प्रभावशाली व्यक्ति। उद्देश्य: ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों, विशेष रूप से रैयतवाड़ी व्यवस्था, के खिलाफ जमींदारों के हितों की रक्षा करना। स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सुधारों की मांग करना। महत्व: इसने पश्चिमी भारत में जमींदारों को संगठित करने में मदद की। यह पूना सर्वजनिक सभा (1870) जैसे बाद के संगठनों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी। स्थानीय स्तर पर राजनीतिक जागरूकता को बढ़ावा दिया।
15. बंगाल इंडियन सोसाइटी (1851): स्थापना: 1851 में, कलकत्ता में। संस्थापक: बंगाल के शिक्षित मध्यम वर्ग और जमींदार। उद्देश्य: भारतीयों के लिए बेहतर प्रशासनिक अवसरों की मांग। ब्रिटिश सरकार की नीतियों, जैसे भारी कर और व्यापारिक शोषण, की आलोचना। भारतीयों को विधायी परिषदों में प्रतिनिधित्व की मांग। महत्व: इसने ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के साथ मिलकर बंगाल में राजनीतिक सक्रियता को बढ़ाया। इसने 1853 के चार्टर एक्ट के नवीकरण के समय भारतीय हितों को उठाने में योगदान दिया।
6. मद्रास प्रेसिडेंसी एसोसिएशन (1860 के दशक): स्थापना: 1860 के दशक में, मद्रास में। संस्थापक: स्थानीय मध्यम वर्ग और व्यापारी। उद्देश्य: ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों, जैसे उच्च कर और भू-राजस्व, के खिलाफ विरोध। दक्षिण भारत में भारतीय व्यापारियों और किसानों के हितों की रक्षा। महत्व: इसने दक्षिण भारत में स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय मंच पर उठाने का प्रयास किया। यह बाद में मद्रास महाजन सभा (1884) के गठन का आधार बनी।
7. इंडियन रिफॉर्म एसोसिएशन (1870): स्थापना: 1870 में, कलकत्ता में। संस्थापक: केशव चंद्र सेन (ब्रह्म समाज से जुड़े)। उद्देश्य: सामाजिक और राजनीतिक सुधारों को बढ़ावा देना। भारतीयों के लिए शिक्षा और प्रशासन में अधिक अवसरों की मांग। ब्रिटिश सरकार को प्रार्थना पत्रों के माध्यम से भारतीय समस्याओं से अवगत कराना। महत्व: इसने सामाजिक सुधारों (जैसे बाल विवाह विरोध, स्त्री शिक्षा) को राजनीतिक मांगों के साथ जोड़ा। इसने बंगाल में मध्यम वर्ग को संगठित करने में मदद की।
18. नेशनल इंडियन एसोसिएशन (1870): स्थापना: 1870 में, लंदन में (भारत और ब्रिटेन में शाखाएं)। संस्थापक: मैरी कारपेंटर, जो एक ब्रिटिश सुधारक थीं, और भारतीय बुद्धिजीवियों का समर्थन। उद्देश्य: भारतीयों की सामाजिक और शैक्षिक प्रगति को बढ़ावा देना। ब्रिटिश जनता को भारत की समस्याओं से अवगत कराना। भारतीय महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक स्थिति में सुधार। महत्व: इसने भारत और ब्रिटेन के बीच संवाद का एक मंच प्रदान किया। इसने भारतीयों की समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने में मदद की। सामाजिक सुधारों के साथ राष्ट्रीय चेतना को जोड़ा।
19. बॉम्बे प्रेसिडेंसी एसोसिएशन (1885 के ठीक पहले): स्थापना: 1880 के दशक में, बॉम्बे में। संस्थापक: फिरोजशाह मेहता, के. टी. तेलंग, और बदरुद्दीन तय्यबजी। उद्देश्य: ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ बॉम्बे प्रेसिडेंसी में भारतीय हितों की रक्षा। प्रशासनिक सुधार और भारतीयों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की मांग। महत्व: इसने बॉम्बे में राष्ट्रीय आंदोलन की नींव रखी। इसके कई नेता बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख सदस्य बने।
20. बंगाल नेशनल चैंबर ऑफ कॉमर्स (1834): स्थापना: 1834 में, कलकत्ता में। संस्थापक: बंगाल के व्यापारी और प्रभावशाली व्यक्ति, जैसे द्वारकानाथ टैगोर। उद्देश्य: भारतीय व्यापारियों के हितों की रक्षा करना। ब्रिटिश व्यापार नीतियों, विशेष रूप से एकतरफा व्यापार और कर नीतियों, के खिलाफ आवाज उठाना। महत्व: इसने बंगाल में व्यापारी वर्ग को संगठित किया और आर्थिक शोषण के खिलाफ जागरूकता फैलाई। यह बंगाल लैंडहोल्डर्स सोसाइटी जैसे संगठनों के लिए प्रेरणा स्रोत थी। इसने आर्थिक मुद्दों को राजनीतिक मांगों से जोड़ा।
21. बॉम्बे नेटिव जनरल एसोसिएशन (1840 के दशक): स्थापना: 1840 के दशक में, बॉम्बे में। संस्थापक: स्थानीय व्यापारी, जमींदार, और शिक्षित मध्यम वर्ग। उद्देश्य: ब्रिटिश शासन की नीतियों, जैसे भू-राजस्व और व्यापार नियमों, के खिलाफ स्थानीय हितों की रक्षा। भारतीयों के लिए प्रशासन में अधिक भागीदारी की मांग। महत्व: इसने बॉम्बे प्रेसिडेंसी में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया। बाद में बॉम्बे एसोसिएशन (1852) जैसे संगठनों के गठन में इसका योगदान रहा।
22. ब्रिटिश इंडियन सोसाइटी ऑफ मद्रास (1850): स्थापना: 1850 में, मद्रास में। संस्थापक: मद्रास के शिक्षित मध्यम वर्ग और स्थानीय नेता। उद्देश्य: दक्षिण भारत में ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों की आलोचना। भारतीयों के लिए शैक्षिक और प्रशासनिक अवसरों की मांग। महत्व: इसने दक्षिण भारत में मध्यम वर्ग को संगठित करने में मदद की। यह मद्रास नेटिव एसोसिएशन और बाद में मद्रास महाजन सभा के गठन का आधार बनी।
3. इंडियन रिफॉर्म सोसाइटी (1853): स्थापना: 1853 में, बंगाल में। संस्थापक: बंगाल के बुद्धिजीवी और सुधारक। उद्देश्य: सामाजिक और राजनीतिक सुधारों को बढ़ावा देना। ब्रिटिश सरकार को प्रार्थना पत्रों के माध्यम से भारतीय समस्याओं से अवगत कराना। शिक्षा और प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की मांग। महत्व: इसने सामाजिक सुधारों (जैसे सती प्रथा, बाल विवाह विरोध) को राजनीतिक मांगों के साथ जोड़ा। इसने बंगाल में राष्ट्रीय चेतना को प्रोत्साहित किया।
24. लखनऊ पॉलिटिकल एसोसिएशन (1860 के दशक): स्थापना: 1860 के दशक में, लखनऊ (अवध क्षेत्र) में। संस्थापक: अवध के स्थानीय जमींदार और शिक्षित वर्ग। उद्देश्य: ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों और प्रशासनिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाना। स्थानीय स्तर पर भारतीय हितों की रक्षा। महत्व: इसने उत्तर भारत, विशेष रूप से अवध क्षेत्र, में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया। इसने स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय मंच पर उठाने का प्रयास किया।
25. कलकत्ता रेंट बिल टेनेंट्स एसोसिएशन (1860 के दशक): स्थापना: 1860 के दशक में, कलकत्ता में। संस्थापक: बंगाल के किसान और मध्यम वर्ग। उद्देश्य: ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों, विशेष रूप से रेंट बिल, के खिलाफ किसानों के हितों की रक्षा। जमींदारों और ब्रिटिश प्रशासन के बीच मध्यस्थता। महत्व: इसने किसानों को संगठित करने के शुरुआती प्रयासों को दर्शाया। इसने बंगाल में ग्रामीण स्तर पर जागरूकता फैलाई।
26. बंगाल नेशनल लीग (1877): स्थापना: 1877 में, कलकत्ता में। संस्थापक: शिशिर कुमार घोष और अन्य बंगाली बुद्धिजीवी। उद्देश्य: भारतीयों में राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक जागरूकता को बढ़ावा देना। ब्रिटिश शासन की नीतियों, जैसे आर्थिक शोषण और प्रशासनिक भेदभाव, के खिलाफ जनमत तैयार करना। भारतीयों के लिए सिविल सेवा (ICS) में अधिक अवसरों की मांग। महत्व: इसने इंडियन एसोसिएशन (1876) के साथ मिलकर बंगाल में राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। इसने मध्यम वर्ग को संगठित करने और ब्रिटिश सरकार को प्रार्थना पत्र भेजने में योगदान दिया। इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के लिए वैचारिक आधार प्रदान किया।
27. मद्रास हिंदू सोशल रिफॉर्म एसोसिएशन (1878): स्थापना: 1878 में, मद्रास में। संस्थापक: स्थानीय शिक्षित मध्यम वर्ग और सामाजिक सुधारक। उद्देश्य: सामाजिक सुधार, जैसे बाल विवाह विरोध और स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना। ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों के खिलाफ दक्षिण भारत में जागरूकता फैलाना। भारतीयों के लिए प्रशासनिक और शैक्षिक अवसरों की मांग। महत्व: इसने सामाजिक और राजनीतिक सुधारों को एक साथ जोड़ा। इसने दक्षिण भारत में मध्यम वर्ग को संगठित करने में मदद की। बाद में यह मद्रास महाजन सभा (1884) के गठन का आधार बनी।
28. पटना एसोसिएशन (1868): स्थापना: 1868 में, पटना (बिहार) में। संस्थापक: बिहार के जमींदार, व्यापारी, और शिक्षित मध्यम वर्ग। उद्देश्य: ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों और करों के खिलाफ स्थानीय हितों की रक्षा करना। बिहार में भारतीयों के लिए प्रशासनिक और शैक्षिक अवसरों की मांग। महत्व: इसने बिहार में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया, जो पहले बंगाल के प्रभाव में था। इसने स्थानीय स्तर पर भारतीयों को संगठित करने का प्रयास किया।
29. बॉम्बे नेटिव एजुकेशन सोसाइटी (1820 के दशक से सक्रिय, राजनीतिक भूमिका 1860 के दशक में): स्थापना: 1820 के दशक में, बॉम्बे में (हालांकि बाद में यह राजनीतिक रूप से सक्रिय हुई)। संस्थापक: बॉम्बे के शिक्षित मध्यम वर्ग और परोपकारी व्यक्ति। उद्देश्य: भारतीयों के लिए शिक्षा को बढ़ावा देना। 1860 के दशक में, इसने ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की, विशेष रूप से व्यापार और प्रशासनिक मुद्दों पर। महत्व: इसने बॉम्बे में शिक्षा के साथ-साथ राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया। इसने बॉम्बे एसोसिएशन (1852) जैसे संगठनों के लिए आधार तैयार किया।
30. अवध पॉलिटिकल क्लब (1870 के दशक): स्थापना: 1870 के दशक में, लखनऊ (अवध) में। संस्थापक: अवध के जमींदार और स्थानीय नेता। उद्देश्य: ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों और प्रशासनिक भेदभाव के खिलाफ स्थानीय हितों की रक्षा। उत्तर भारत में भारतीयों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की मांग। महत्व: इसने उत्तर भारत, विशेष रूप से अवध क्षेत्र, में राजनीतिक जागरूकता को प्रोत्साहित किया। इसने स्थानीय स्तर पर जमींदारों और मध्यम वर्ग को संगठित करने में योगदान दिया।
31. इंडियन यूनियन (1878): स्थापना: 1878 में, कलकत्ता में। संस्थापक: आनंद मोहन बोस और अन्य बंगाली बुद्धिजीवी। उद्देश्य: भारतीयों में राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना। ब्रिटिश शासन की नीतियों, जैसे सिविल सेवा में भारतीयों की कम भागीदारी, के खिलाफ आवाज उठाना। सामाजिक और राजनीतिक सुधारों को प्रोत्साहित करना। महत्व: इसने इंडियन एसोसिएशन के साथ मिलकर बंगाल में राष्ट्रीय आंदोलन की नींव को मजबूत किया। इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के लिए प्रारंभिक मंच प्रदान किया।
32. बंगाल पब्लिक एसोसिएशन (1860 के दशक): स्थापना: 1860 के दशक में, कलकत्ता में। संस्थापक: बंगाल के शिक्षित मध्यम वर्ग और स्थानीय नेता। उद्देश्य: ब्रिटिश शासन की नीतियों, जैसे भू-राजस्व और कराधान, के खिलाफ जनमत तैयार करना। भारतीयों के लिए प्रशासनिक और शैक्षिक अवसरों की मांग। सामाजिक और राजनीतिक सुधारों को बढ़ावा देना। महत्व: इसने बंगाल में मध्यम वर्ग को संगठित करने में मदद की। इसने ब्रिटिश सरकार को प्रार्थना पत्र भेजकर भारतीय समस्याओं को उजागर किया। इसने बाद के संगठनों, जैसे इंडियन एसोसिएशन, के लिए आधार तैयार किया।
33. पूना पब्लिक सोसाइटी (1867): स्थापना: 1867 में, पूना (महाराष्ट्र) में। संस्थापक: महादेव गोविंद रानाडे और अन्य मराठी बुद्धिजीवी। उद्देश्य: ब्रिटिश नीतियों, विशेष रूप से रैयतवाड़ी भू-राजस्व व्यवस्था, के खिलाफ स्थानीय हितों की रक्षा। सामाजिक सुधार (जैसे स्त्री शिक्षा, बाल विवाह विरोध) को राजनीतिक मांगों के साथ जोड़ना। भारतीयों के लिए प्रशासन में अधिक भागीदारी की मांग। महत्व: इसने पूना सर्वजनिक सभा (1870) के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। इसने पश्चिमी भारत में राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाया। रानाडे जैसे नेताओं ने सामाजिक और राजनीतिक सुधारों को एक साथ जोड़ा।
34. मद्रास लैंडहोल्डर्स एसोसिएशन (1860 के दशक): स्थापना: 1860 के दशक में, मद्रास में। संस्थापक: दक्षिण भारत के जमींदार और मध्यम वर्ग। उद्देश्य: ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों के खिलाफ जमींदारों और किसानों के हितों की रक्षा। स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सुधारों की मांग। महत्व: इसने दक्षिण भारत में जमींदारों को संगठित करने में मदद की। इसने मद्रास नेटिव एसोसिएशन और मद्रास महाजन सभा जैसे संगठनों के लिए आधार तैयार किया।
35. इंडियन सोसाइटी (1872): स्थापना: 1872 में, कलकत्ता में। संस्थापक: आनंद मोहन बोस और अन्य बंगाली सुधारक। उद्देश्य: भारतीयों में राष्ट्रीय एकता और जागरूकता को बढ़ावा देना। ब्रिटिश शासन की नीतियों, जैसे सिविल सेवा में भारतीयों की कम भागीदारी, के खिलाफ आवाज उठाना। सामाजिक सुधारों को राजनीतिक मांगों के साथ जोड़ना। महत्व: इसने इंडियन एसोसिएशन (1876) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने बंगाल में शिक्षित मध्यम वर्ग को संगठित करने में योगदान दिया।
36. अहमदाबाद पॉलिटिकल एसोसिएशन (1870 के दशक): स्थापना: 1870 के दशक में, अहमदाबाद (गुजरात) में। संस्थापक: गुजरात के व्यापारी, जमींदार, और शिक्षित मध्यम वर्ग। उद्देश्य: ब्रिटिश व्यापार और भू-राजस्व नीतियों के खिलाफ स्थानीय हितों की रक्षा। भारतीयों के लिए प्रशासनिक और शैक्षिक अवसरों की मांग। महत्व: इसने गुजरात में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया। इसने बॉम्बे प्रेसिडेंसी के अन्य संगठनों के साथ समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया।
स्थापित करने का प्रयास किया। 37. बंगाल रेंट एसोसिएशन (1870 के दशक): स्थापना: 1870 के दशक में, बंगाल में। संस्थापक: बंगाल के किसान और मध्यम वर्ग। उद्देश्य: ब्रिटिश रेंट बिल और भू-राजस्व नीतियों के खिलाफ किसानों के हितों की रक्षा। जमींदारों और ब्रिटिश प्रशासन के बीच मध्यस्थता। महत्व: इसने बंगाल में ग्रामीण स्तर पर जागरूकता फैलाई। इसने किसानों को संगठित करने के शुरुआती प्रयासों को दर्शाया।
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