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Surat Session of the Congress, 1907
jp Singh 2025-05-29 10:47:16
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कांग्रेस का सूरत अधिवेशन, 1907

कांग्रेस का सूरत अधिवेशन, 1907
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सूरत अधिवेशन (1907) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद घटना थी, क्योंकि इस अधिवेशन में कांग्रेस के भीतर उदारवादी (Moderates) और उग्रवादी (Extremists) धड़ों के बीच मतभेद इतने बढ़ गए कि कांग्रेस का औपचारिक विभाजन हो गया। यह अधिवेशन कांग्रेस के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। नीचे सूरत अधिवेशन, 1907 के प्रमुख बिंदुओं का संक्षिप्त अवलोकन दिया गया है
1. पृष्ठभूमि
समय और स्थान: सूरत अधिवेशन दिसंबर 1907 में गुजरात के सूरत में आयोजित हुआ। संदर्भ: 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन ने राष्ट्रीय चेतना को प्रज्वलित किया था। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में स्वराज्य की मांग को स्वीकार किया गया था, लेकिन उदारवादी और उग्रवादी धड़ों के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ रहे थे। उदारवादी: गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता, और सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे नेता संवैधानिक तरीकों (याचिका, प्रार्थना, और सुधार) के पक्षधर थे। वे स्वराज्य को औपनिवेशिक ढांचे के भीतर स्व-शासन के रूप में देखते थे। उग्रवादी: बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेता स्वदेशी, बहिष्कार, और प्रत्यक्ष कार्रवाई (आवश्यक होने पर हिंसक साधन) के पक्ष में थे। वे स्वराज्य को पूर्ण स्वतंत्रता के रूप में चाहते थे।
तनाव का कारण: कलकत्ता अधिवेशन (1906) में उग्रवादियों का प्रभाव बढ़ा था, जिससे उदारवादी असहज थे। सूरत अधिवेशन में दोनों धड़ों के बीच नेतृत्व और नीतियों को लेकर खुला टकराव हुआ।
2. सूरत अधिवेशन की प्रमुख घटनाएं
अध्यक्षता विवाद: उदारवादियों ने रास बिहारी घोष को अध्यक्ष के रूप में प्रस्तावित किया, जो एक उदारवादी नेता थे। उग्रवादियों, विशेषकर बाल गंगाधर तिलक के समर्थकों, ने इसका विरोध किया। तिलक स्वयं अध्यक्ष बनना चाहते थे या किसी उग्रवादी नेता को समर्थन देना चाहते थे, ताकि स्वदेशी और स्वराज्य के लिए आक्रामक रणनीति अपनाई जा सके। विवाद का चरम: अधिवेशन के दौरान, जब रास बिहारी घोष मंच पर आए, तो उग्रवादी समर्थकों ने नारेबाजी और हंगामा शुरू कर दिया। उग्रवादियों ने घोष के अध्यक्ष चुने जाने को अनुचित ठहराया। तिलक ने मंच पर जाकर अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन उदारवादियों ने उन्हें बोलने से रोका। इससे स्थिति और बिगड़ गई। हंगामे के दौरान मंच पर जूते और अन्य वस्तुएं फेंकी गईं, जिससे अधिवेशन में अराजकता फैल गई।
विभाजन: हंगामे के कारण अधिवेशन को स्थगित करना पड़ा। इसके बाद, उदारवादियों ने उग्रवादियों को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। उग्रवादी नेताओं ने अलग से अपनी सभाएं शुरू कीं, जिससे कांग्रेस औपचारिक रूप से दो हिस्सों में बंट गई: उदारवादी कांग्रेस और उग्रवादी समूह।
3. सूरत विभाजन के कारण
वैचारिक मतभेद: उदारवादी संवैधानिक सुधारों और ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग पर जोर दे रहे थे, जबकि उग्रवादी प्रत्यक्ष कार्रवाई, स्वदेशी, और बहिष्कार जैसे आक्रामक तरीकों को अपनाना चाहते थे। स्वराज्य की परिभाषा: उदारवादियों के लिए स्वराज्य का अर्थ था औपनिवेशिक ढांचे के भीतर स्व-शासन, जबकि उग्रवादियों के लिए यह पूर्ण स्वतंत्रता थी। रणनीति का अंतर: उग्रवादी स्वदेशी आंदोलन को और तेज करना चाहते थे, जबकि उदारवादी इसे सीमित और नियंत्रित रखना चाहते थे। नेतृत्व का टकराव: तिलक जैसे उग्रवादी नेताओं की लोकप्रियता और जन समर्थन से उदारवादी असहज थे।
4. सूरत अधिवेशन के परिणाम
कांग्रेस का कमजोर होना: सूरत विभाजन ने कांग्रेस को संगठनात्मक रूप से कमजोर कर दिया। उग्रवादी नेताओं के निष्कासन से कांग्रेस में जन-आधारित नेतृत्व की कमी हो गई। उग्रवादी गतिविधियों का बढ़ना: उग्रवादी नेताओं ने कांग्रेस से बाहर रहकर स्वदेशी, बहिष्कार, और क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा दिया। इससे क्रांतिकारी संगठनों, जैसे अनुशीलन समिति और गदर आंदोलन, को प्रोत्साहन मिला। ब्रिटिश दमन: ब्रिटिश सरकार ने इस विभाजन का फायदा उठाया और उग्रवादी नेताओं (जैसे तिलक, लाला लाजपत राय) को गिरफ्तार कर कठोर दमनकारी नीतियां अपनाईं। लंबे समय का प्रभाव: सूरत विभाजन ने कांग्रेस के भीतर एकता की आवश्यकता को उजागर किया। 1916 में लखनऊ अधिवेशन में उदारवादी और उग्रवादी धड़े फिर से एकजुट हुए, लेकिन तब तक स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारी और गांधीवादी धाराएं मजबूत हो चुकी थीं।
5. प्रमुख व्यक्तित्व
उदारवादी नेता: गोपाल कृष्ण गोखले, रास बिहारी घोष, फिरोजशाह मेहता, सुरेंद्रनाथ बनर्जी। उग्रवादी नेता: बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल। प्रभाव: तिलक की लोकप्रियता और उनके निष्कासन ने जनता में ब्रिटिश विरोधी भावनाओं को और भड़काया।
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